खप्पर-मिट्टी के घर से शुरू हुआ सफर, हजारों बच्चों का भविष्य संवारकर बने शिक्षा जगत की प्रेरणादायी शख्सियत; 63 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति के बाद भी नन्हे बच्चों को दे रहे निःशुल्क शिक्षा

कहते हैं कि एक शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, क्योंकि उसके द्वारा जलाया गया शिक्षा का दीपक पीढ़ियों तक रोशनी देता रहता है। कुछ लोग अपनी नौकरी पूरी करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने जीवन को ही शिक्षा और समाज के नाम समर्पित कर देते हैं। ऐसी ही प्रेरणादायी शख्सियत हैं शिक्षक कन्हैया लाल श्रीवास, पिता श्री रामाधर श्रीवास जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लगभग 44 वर्षों तक अपनी सेवाएं देकर हजारों बच्चों के भविष्य को नई दिशा दी। खास बात यह है कि 63 वर्ष की उम्र में विभागीय सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका शिक्षा के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। आज भी वे विद्यालयों में पहुंचकर छोटे-छोटे बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं।

खप्पर-मिट्टी के घर से शुरू हुआ संघर्ष का सफर
कन्हैया लाल श्रीवास का जन्म 10 फरवरी 1964 को ग्राम पंचायत गोधना, विकासखंड नवागढ़, जिला जांजगीर-चांपा में हुआ। वह दौर ऐसा था, जब गांवों में शिक्षा की सुविधाएं सीमित थीं। गांव की कम आबादी, खप्पर और मिट्टी के मकान, बिजली और बेहतर विद्यालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव। परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन उनके सपने बड़े थे। संसाधनों की कमी उनके हौसलों को कमजोर नहीं कर सकी। गांव में ही कठिन परिस्थितियों के बीच शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने शिक्षक बनने का सपना साकार किया।उनके जीवन का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से समाज में बदलाव लाना था। इसी संकल्प के साथ उन्होंने शिक्षक के रूप में अपने जीवन की नई पारी शुरू की।

21 सितंबर 1982 से शुरू हुआ सेवा और समर्पण का अध्याय!
दिनांक 21 सितंबर 1982 को उनकी प्रथम नियुक्ति हुई। इसके बाद शुरू हुआ शिक्षा, संघर्ष और जिम्मेदारियों से भरा ऐसा सफर, जिसने हजारों विद्यार्थियों के जीवन को प्रभावित किया। प्राथमिक शिक्षा से लेकर मिडिल स्कूल और फिर उच्चतर माध्यमिक स्तर तक की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने अपनी मेहनत, अनुभव और कार्यशैली से अलग पहचान बनाई। उनकी कर्मठता और अनुभव का परिणाम रहा कि वे शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय खरौद के प्राचार्य पद तक पहुंचे। यह सफर केवल पदोन्नति की कहानी नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और शिक्षा के प्रति अटूट निष्ठा की मिसाल है।

रिटायर हुए, लेकिन गुरु का धर्म आज भी जारी है!
आमतौर पर सेवानिवृत्ति के बाद व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर आराम का जीवन बिताना चाहता है, लेकिन कन्हैया लाल श्रीवास के लिए शिक्षा केवल सरकारी सेवा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है। 44 वर्षों तक विभाग में अपनी सेवाएं देने के बाद भी उनका मन विद्यालय और बच्चों से अलग नहीं हो पाया।आज भी वे विद्यालयों में पहुंचकर नन्हे-मुन्ने बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं। न कोई वेतन, न किसी पद की अपेक्षा और न ही किसी पुरस्कार की चाह। उनका प्रयास है कि बच्चों की नींव मजबूत हो, वे बेहतर शिक्षा प्राप्त करें और अपने जीवन में आगे बढ़ें। यही वह भावना है, जो एक सामान्य शिक्षक को असाधारण व्यक्तित्व बनाती है।

हजारों विद्यार्थियों के जीवन में आज भी जीवित है उनका योगदान
किसी शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका पद या सम्मान नहीं, बल्कि वे विद्यार्थी होते हैं जो उसके मार्गदर्शन से अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में सफलता हासिल करते हैं। कन्हैया लाल श्रीवास के मार्गदर्शन में पढ़े हजारों विद्यार्थी आज अपने जीवन में आगे बढ़ रहे हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं। शिक्षक के रूप में उनके द्वारा बोए गए ज्ञान और संस्कार के बीज आज अनेक परिवारों के भविष्य को रोशन कर रहे हैं। यही किसी गुरु की असली कमाई और सबसे बड़ा सम्मान है।
एक व्यक्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं कन्हैया लाल श्रीवास !
ग्राम गोधना की साधारण परिस्थितियों से निकलकर शिक्षा जगत में अपनी पहचान बनाने और सेवानिवृत्ति के बाद भी निःशुल्क शिक्षा की अलख जगाने वाले कन्हैया लाल श्रीवास आज समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि शिक्षा की सेवा किसी उम्र, पद या नौकरी की मोहताज नहीं होती। आज जब शिक्षा को कई बार केवल रोजगार और आजीविका का माध्यम समझा जाता है, ऐसे समय में उनका समर्पण समाज को याद दिलाता है कि एक सच्चा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि पीढ़ियों का भविष्य गढ़ता है। कन्हैया लाल श्रीवास का जीवन एक ऐसा संदेश है, जिसे शब्दों में समेटना आसान नहीं। 44 वर्षों की सरकारी सेवा उनके कार्यकाल का हिसाब हो सकता है, लेकिन बच्चों के जीवन में उनके योगदान का हिसाब कभी पूरा नहीं हो सकता। विभाग से उनकी सेवानिवृत्ति जरूर हुई है, मगर गुरु के रूप में उनकी जिम्मेदारी आज भी जारी है। सच ही कहा गया है—दीपक स्वयं जलता है, तभी दूसरों के जीवन में उजाला करता है। कन्हैया लाल श्रीवास आज भी उसी दीपक की तरह शिक्षा का प्रकाश फैला रहे हैं।
ऐसे गुरु को नमन, जिनकी सेवा का अंत सेवानिवृत्ति से नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा है।
