Sunday, March 29, 2026
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नवागढ़ ब्लॉक में ‘सचिव राज’ का काला सच, फर्जी बिल, बाउचर और दो-दो मृत्यु प्रमाणपत्र… किसकी शह पर खेला जा रहा है यह खेल, परत दर परत खुलेंगे सारे राज।

जांजगीर–चांपा में नवागढ़ ब्लॉक के पंचायत क्षेत्रों में इन दिनों एक ही नाम की चर्चा है—एक ऐसा पंचायत सचिव, जिसकी कार्यशैली को लेकर गांव-गांव में सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यह सचिव जहां भी जाता है, वहां विकास रुक जाता है और विवाद शुरू हो जाते हैं। गांवों की गलियों में आजकल एक ही चर्चा है—“पैसा आता है पंचायत के लिए… और गायब हो जाता है किसी और के खाते में!

क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर साज़िश:– ग्रामीणों का दावा है कि पंचायतों को मिलने वाली विकास राशि को यह सचिव फर्जी बिल–बाउचर के आधार पर खर्च दिखाकर “कागज़ों में विकास” कर देता है, जबकि ज़मीन पर हालात जस के तस बने रहते हैं। किसी पंचायत में अपूर्ण कार्य, कहीं आधा-अधूरा निर्माण… और कहीं नाममात्र की खरीद — लेकिन भुगतान पूरा! अब बड़ा सवाल ये है कि किसके संरक्षण में यह ‘बिल–बाउचर’ खेल चल रहा है?

सबसे चौंकाने वाली जानकारी, एक व्यक्ति के दो–दो मृत्यु प्रमाणपत्र?

सूत्र बताते हैं कि एक ही व्यक्ति के दो अलग-अलग मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किए जाने का मामला भी इन दिनों ब्लॉक में चर्चा का विषय है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह “चमत्कार” भी इत्तफाक नहीं, बल्कि ‘कुशलता का कमाल’ बताया जा रहा है—वही कुशलता जिसने पंचायत फंड को चूसने की अनोखी क्षमता पैदा कर दी है। क्या यही है ईमानदारी का दावा, या फिर ईमानदारी की आड़ में भ्रष्टाचार का महाकुंभ। गांव के लोग खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक पंचायत सचिव के रिश्तेदारों और परिचितों के खातों में ही विकास के “खर्च” क्यों पहुंचते हैं? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो फिर हर पंचायत में उसके आते ही शिकायतों का पहाड़ क्यों खड़ा हो जाता है?

प्रशासन की खामोशी, आखिर किसका संरक्षण:–गांवों में खुलकर कहा जा रहा है कि सचिव साहब फाइलों में विकास बनाते हैं… और जमीन पर धूल उड़ती रहती है। लेकिन प्रशासन अब तक चुप है। लोग पूछ रहे हैं— क्या अधिकारी इस खेल से वाकिफ नहीं? या फिर आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं, ग्रामीणों की मांग साफ है निष्पक्ष जांच हो। हर बिल, हर बाउचर की जांच हो। हर खाते की पड़ताल हो। सवाल जितने गंभीर हैं, जवाब उतने ही जरूरी। और जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, नवागढ़ ब्लॉक की पंचायतें इसी सवाल के साथ खड़ी रहेंगी—विकास का पैसा किसके पेट में जा रहा है?”

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